सोमवार, 28 अप्रैल 2014

दोहों में मजदूर




                  दोहों में मजदूर       


जगत में  ' मजदूर दिवस ' , एक मई को होय . 

ऑफिसों - फैक्टरियों  में , मिले छुट्टी हर कोय .


अनपढ़ हुए तो क्या हुआ , करते परिश्रम खूब . 

सर्दी , गर्मी , वर्षा ऋतु  में , काम में रहते डूब .


श्रम  से ना  दम फूलता , आता खूब स्वेद .

दिन - रात परिश्रम  करके , भरते अपना पेट .


मानसिक - शारीरिक श्रम,  में करे राष्ट्र भेद .

है श्रमिक का कम वेतन ,  ' मंजू ' होता खेद .


नहीं है  सिर ढकने का  , स्थल  भी  उनके पास .

बनाय  औरों के लिए , घर , भवन , शहर खास .  


न हो अगर संसार में , कोई भी मजदूर .

तो न होते महल - नगर , न ही  ' ताज ' - सा नूर .



 नहीं मिलती उन्हें इज्जत , न मिले हैं   पुरस्कार . 

ना ही हैं वस्त्र - आवास , ना आहार -  विहार . 


तन  - मन  का  गम भुलाने , पिए लेता  शराब .

बर्बाद होता परिवार , बेचे जो सरकार .


करते  ' बाल -  मजदूरी ' , सहते  धुआँ - दुर्गंध .

बनाते धूप -  अगरबत्ती ,  करें जग में सुगंध . 


दुकान  , ढाबा , घरों में , करें  हैं बच्चे काम . 

बचपन बूढा हो जाय ,  होय  देश बदनाम  .


करे जग इनका शोषण , मिलती गाली - मार .

छुट्टी पर काटे पगार , होते जब बीमार . 


भटकते  हैं इधर -उधर , होय  कुसंग शिकार .

माफिया , डाकू बन के , करें हैं बलात्कार . 


जीने के लिए करते , हाड़ - तोड़ वे काम .

ना  मिलता   शिक्षा - इलाज  , होते  वे लाचार . 


बन्धुआ मजदूर बन के , चुकाते हैं लगान .

मानवता का हो रहा ,खुला घोर अपमान .


समस्या के लिए हल हो ,  ' बन्धुआ मुक्ति अभियान '
 
पुनर्वास की हो व्यवस्था , बने कठोर विधान . 



नैतिकता -  राष्ट्र हित में ,  सरकार होय ध्यान . 

दे घर , स्कूल , सुविधाएं , राज्य बढ़ाए हाथ . 

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