मंगलवार, 15 सितंबर 2015

सहज साहित्य: आखर -आखर पढ़ मुझे

सहज साहित्य: आखर -आखर पढ़ मुझे


4-मंजु गुप्ता
1  दोहों की धड़कनों में हिंदी 
हिन्दी  की धड़कनों में बहे व्याकरण  धार। 
रस छंद अलंकार हैं कविता के  शृंगार।  
2
हिन्दी  अब वैश्विक हुई भारत  की पहचान।
विज्ञापन से बढ़ रही हिन्द की शक्ति - शान।   
3
अहिन्दी भाषी वास्ते किया इसे आसान।
राजभाषा हेतु गढ़ा सरल हिन्दी  विधान। 
4
एकता की भाषा है है राष्ट्र की जान।
चुनौतियों में चमकती हिन्दी  की पहचान। 
5
बसते कबीर - सूर के  हिन्दी  में हैं  प्राण।

जिस पर रीझ के मीरा नाची गा  के श्याम। 

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

सहज साहित्य: यादों के झरोखे में कलाम

सहज साहित्य: यादों

यादों के झरोखे में कलाम



मंजु गुप्ता

'' बने धरती कैसे खुशहाल "
उस पल  हुई साँसें बेहाल
कह न पाई अपनी बात
विदा हो गईं ले के कलाम।

 

गूगल से साभार

गमगीन आँखें दें   विदाई
देता देश - विश्व  सलामी
देश को समर्पित जिंदगानी
दे  श्रद्धांजलि हर  भारतवासी।


अभावों - मुश्किलों भरी जिंदगी
परिश्रम - सच्चाई करे न्दगी
मन तरंगे हालात से   खूब लड़ी
छुई उड़ाने परमाणु की कामयाबी की।


विशाल सोच चिंतन के ध्यानी
थे शिक्षक आध्यात्मिक ज्ञानी
आदर्शों अंतस् प्रज्ञा के धनी
विंग्स ऑफ फायर लोकप्रिय बड़ी।


मानवीय पूँजी थी बड़ी भारी
बैंक पूँजी में खाता था  खाली

रसीला फलदार  वृक्ष सरीखा
विनम्र प्रतिमूर्ति योगदानोंवाली।


बढ़ाया विश्व में अग्नि '  ' पृथ्वी से मान
मिला  मिसाइल मैन ' ; भारत रत्न '   खिताब
लक्ष्य  बीस हजार बीस '  तक का सपना
करना था   देश को विकसित अपना।


चढ़ी रहती अथक कामों की धुन
सफलता की समृद्धि सपनों से बुन
किया मेल अध्यात्म - विज्ञान का
जिया जीवन गीता ' - ' कुरान ' - सा


बन राष्ट्रपति बाल - जन -युवा में बेमिसाल
नई सोच विज्ञान -  चिकित्सा की बनी मिसाल
सभी परम्परा - संस्कृतियों  में गए थे घुल
रूढ़ियों - कुरीतियों की तोड़ी अमिट  दीवार।


जर्रे - जर्रे को कर गए खुशहाल
न करना मेरे मरने पे अवकाश
करना देशवासियों दुगना काम '
करेंगी  सदा' पीढ़ियाँ उन्हें याद
                                -0-
               
               

6 comments:

  1. bharat -ratn kalam ke charoNon mein shradhanjali arpit karati kavita unake satkarmon ko batati hui bahut achhi kavita hai. manju ji badhai.
    pushpa mehra.
    Reply
  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 31 जुलाई 2015 को लिंक की जाएगी...............http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!
    Reply
  3. Dr Kalam ko Vinamr Shraddhaanjali arpit karte huye main aapke vicharon ka swagat karta hoon. People come and go but some come here never to go because they keep us inspiring and Dr APJ Abdul Kalam is one among them. Let us keep the torch on and follow his path Manju Gupta ji !
    Reply
  4. अच्छी कविता । बधाई
    Reply
  5. विनम्र श्रद्धांजलि उन महान शख़्सियत को, जिन्होंने अपने हर कार्य से इस देश को, मानवता को गौरवान्वित किया, सभी को सही मार्ग दिखाया।

    ~सादर
    अनिता ललित
    Reply
  6. aap sb tk mre mnobhaav aap pahunchane ke lie bhaai Himaanshu ji ka aabhar .guni janon

    अनिता ललित , अनिता ji , Subhash ji , Digvijay ji , vraishth kvytri Pushpa ji aabhar .
    ReplyDelete
 के झरोखे में कलाम

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

शादी की साल गिरह आ गई फिर एक बार 

सजना संग खुशियाँ रहेगी बरकरार .

सजे हैं घर , नगर के गलियारे

सजे हैं सोलह श्रृंगार सारे .

लाली सुहाग ने किया करार 

खिलेगी सिंदूर से सदा बहार .


शादी की साल गिरह आ गई फिर एक बार 

सजना संग खुशियाँ रहेगी बरकरार .


टीका , बिंदिया पी से हुए निहाल 

घटा का काजल इश्क का कहे हाल . 

प्रीत गजरा महका रहा खुमार 

धड़कनें धड़के ले के पयार 

शादी की साल गिरह आ गई फिर एक बार 

सजना संग खुशियाँ रहेगी बरकरार .

लाली लवों की करे लालमलाल 

हिना ने रंग दिए दिल लाल लाल .

नग अँगूठी में दिखे पी की मुरत 

प्रेम नगर में रंगी आज कुदरत .

खन खन चुड़ियां मिलन का करें शोर 

पायल , बिछया पर चले न जोर .

जश्ने इश्क का मंजु हुआ इजहार 

दुलारी दुआएँ गाए दिलदार .

बुधवार, 13 अगस्त 2014

त्रिवेणी: इन्द्रधनुषी राखी

त्रिवेणी: इन्द्रधनु


मुझे भी सभी के सेदोको उत्कृष्ट लगे .

अभी का आभार .

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

दोहों में मजदूर




                  दोहों में मजदूर       


जगत में  ' मजदूर दिवस ' , एक मई को होय . 

ऑफिसों - फैक्टरियों  में , मिले छुट्टी हर कोय .


अनपढ़ हुए तो क्या हुआ , करते परिश्रम खूब . 

सर्दी , गर्मी , वर्षा ऋतु  में , काम में रहते डूब .


श्रम  से ना  दम फूलता , आता खूब स्वेद .

दिन - रात परिश्रम  करके , भरते अपना पेट .


मानसिक - शारीरिक श्रम,  में करे राष्ट्र भेद .

है श्रमिक का कम वेतन ,  ' मंजू ' होता खेद .


नहीं है  सिर ढकने का  , स्थल  भी  उनके पास .

बनाय  औरों के लिए , घर , भवन , शहर खास .  


न हो अगर संसार में , कोई भी मजदूर .

तो न होते महल - नगर , न ही  ' ताज ' - सा नूर .



 नहीं मिलती उन्हें इज्जत , न मिले हैं   पुरस्कार . 

ना ही हैं वस्त्र - आवास , ना आहार -  विहार . 


तन  - मन  का  गम भुलाने , पिए लेता  शराब .

बर्बाद होता परिवार , बेचे जो सरकार .


करते  ' बाल -  मजदूरी ' , सहते  धुआँ - दुर्गंध .

बनाते धूप -  अगरबत्ती ,  करें जग में सुगंध . 


दुकान  , ढाबा , घरों में , करें  हैं बच्चे काम . 

बचपन बूढा हो जाय ,  होय  देश बदनाम  .


करे जग इनका शोषण , मिलती गाली - मार .

छुट्टी पर काटे पगार , होते जब बीमार . 


भटकते  हैं इधर -उधर , होय  कुसंग शिकार .

माफिया , डाकू बन के , करें हैं बलात्कार . 


जीने के लिए करते , हाड़ - तोड़ वे काम .

ना  मिलता   शिक्षा - इलाज  , होते  वे लाचार . 


बन्धुआ मजदूर बन के , चुकाते हैं लगान .

मानवता का हो रहा ,खुला घोर अपमान .


समस्या के लिए हल हो ,  ' बन्धुआ मुक्ति अभियान '
 
पुनर्वास की हो व्यवस्था , बने कठोर विधान . 



नैतिकता -  राष्ट्र हित में ,  सरकार होय ध्यान . 

दे घर , स्कूल , सुविधाएं , राज्य बढ़ाए हाथ . 

शनिवार, 21 सितंबर 2013

नई सुबह की आशीषें

प्यारी लाडली लवली 

असीम अपरिमित अनंत प्यार .


पर्वों का पर्वराज वर्षगांठ की सुनहरी पावन तारीख २१ सितबर के स्वर्णिम सुअवसर पर परिवार - समाज जग की ओर से प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष 

रूप से जुड़े जन - मन की ओर से  हार्दिक बधाई प्रेषित कर रही हूँ .

शब्दों को गूँथ कर उपहार गजल का प्रेषित कर रही हूँ .

नई सुबह की आशीषें 

षोडशोपचार गाती नई सुबह आई 

पर्व जन्म दिन मनाने माँ - पिता शुचि आई . 

स्वागत में नवरंग - रस से शुभ दिन सजा 

नभ ने भी आशीषों की झड़ी लगाई .

महके जीवन का पल - पल खुशियों से 

रहेगी सदा साथ ममता कई परछाई . 

निवाए हाथों से जब खिलाती बचपन 

अनुगूँज किलकारियां दूर करे तन्हाई .

नहीं आय ककहरा सिखाती कई बार 

बनी डॉक्टर लिए शिक्षा की गहराई . 

सुनहरी रश्मियाँ दुआओं के शहर में 

ऊँचाइयां उजाले की लेकर आई .

लिए प्रेम रंग चाहत रंगने आया 

सिंधु आरजू में चम्पई मुस्कान छाई .

अनुराग को इक दिन बिछडना पड़ता

लिखते - लिखते आँखें आज छलछलाई .

वर्षा रहा ढेर आशीर्वाद हर वरद हस्त 

' मंजु '  ' सदा सुखी रहो ' गाए शाहनाई . 

अनंत मंगल कामनाओं के साथ - 

माँ